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अपराध से पहले भी सत्यापन, बाद में भी, लेकिन वारदात के वक्त कहाँ है पुलिस? – Uttarakhand Samachar



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उत्तराखंड में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, उसने ‘देवभूमि’ की शांत छवि पर गहरा दाग लगा दिया है। हल्द्वानी से लेकर देहरादून और हरिद्वार तक, हालिया महीनों में हुई सनसनीखेज वारदातों ने राज्य के सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी है। इन सबके बीच डीजीपी दीपम सेठ द्वारा घोषित “सत्यापन अभियान” पर अब विशेषज्ञों और आम जनता ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सवाल सीधा है—जब पुलिस की मौजूदगी में कत्ल हो रहे हों, तो क्या केवल सत्यापन से अपराध रुकेंगे?

वारदात दर वारदात: पुलिस की नाकामी के पांच बड़े सबूत

जनता का तर्क है कि सत्यापन केवल किरायेदारों का होता है, लेकिन संगठित और शातिर अपराधी तो सिस्टम की नाक के नीचे खेल कर रहे हैं:

  1. मच्छी बाजार हत्या (देहरादून): मृतका ने वारदात से एक-दो दिन पहले ही शिकायत की थी। पुलिस ने समय पर एक्शन नहीं लिया और नतीजा कत्ल के रूप में सामने आया।

  2. गैस एजेंसी संचालक की हत्या: संपत्ति विवाद का मामला कोर्ट में था, पुलिस को खतरे की लिखित सूचना थी, फिर भी दिनदहाड़े हत्या हो गई। यहाँ इंटेलिजेंस कहाँ थी?

  3. विक्रम शर्मा केस: झारखंड के अपराधी ने देहरादून में क्रशर चला लिया। सवाल यह है कि सत्यापन के दौरान उसका आपराधिक रिकॉर्ड सामने क्यों नहीं आया?

  4. हल्द्वानी डबल मर्डर: मुख्य आरोपी पहले से हिस्ट्रीशीटर था। जब अपराधी पुलिस के रिकॉर्ड में था, तो उसकी गतिविधियों पर निगरानी क्यों नहीं रही?

  5. पुलिस कस्टडी में मर्डर (हरिद्वार): दिसंबर 2025 की यह घटना सबसे शर्मनाक रही। पुलिस के घेरे में गैंगस्टर का मारा जाना दर्शाता है कि अपराधियों में कानून का खौफ खत्म हो चुका है।

इंटेलिजेंस फेलियर या राजनीतिक व्यस्तता?

जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड पुलिस का खुफिया तंत्र (Intelligence) केवल राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी तक सीमित हो गया है। जमीनी स्तर पर अपराधियों के बीच क्या पक रहा है, इसकी भनक तक नहीं लग पा रही है। सत्यापन अभियान एक पुरानी और घिसी-पिटी रणनीति बन गई है, जो संगठित अपराधियों को रोकने में नाकाम रही है।

जनता की मांग: सत्यापन नहीं, सक्रिय पुलिसिंग चाहिए

केवल आईडी कार्ड चेक करने से अपराध नहीं रुकेगा। विशेषज्ञों ने कुछ ठोस कदम सुझाए हैं:

  • डिजिटल ट्रैकिंग: अपराधियों की रीयल-टाइम डिजिटल निगरानी।

  • अंतरराज्यीय समन्वय: पड़ोसी राज्यों के साथ अपराधियों का डाटा शेयरिंग।

  • इंटेलिजेंस ऑडिट: सूचना तंत्र का नियमित ऑडिट और जवाबदेही।

  • पब्लिक कनेक्ट: पुलिस और जनता के बीच सीधा संवाद, ताकि मुखबिरी तंत्र मजबूत हो सके।


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