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उत्तराखंड पुलिस: आपकी सेवा में, सदैव तत्पर”—यह वाक्य हर थाने की दीवार पर अंकित है। लेकिन बहादराबाद क्षेत्र में 22 फरवरी की रात ट्रक चालक फिरोज़ के साथ जो हुआ और उसके बाद पुलिस ने जो किया, उसने इस वाक्य की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक तरफ बेरहमी से पीटा गया युवक है, तो दूसरी तरफ ‘काउंटर एफआईआर’ का सुरक्षा कवच।
घटनाक्रम और पुलिस की संदिग्ध कार्यप्रणाली
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FIR में 48 घंटे की देरी क्यों? नियम के अनुसार, संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) की सूचना मिलते ही पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। यदि फिरोज़ ने 22 तारीख की रात को ही 112 पर कॉल किया था, तो पुलिस को 24 तारीख का इंतज़ार क्यों करना पड़ा? यह देरी अक्सर साक्ष्यों से छेड़छाड़ या आरोपियों को बचाने की आशंका पैदा करती है।
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CCTV और 112 कॉल रिकॉर्ड: सत्य का प्रमाण कहाँ है? आज के डिजिटल युग में पुलिस के पास किसी भी घटना की सच्चाई जानने के लिए दो सबसे बड़े हथियार हैं—CCTV फुटेज और कॉल लोकेशन। अगर पुलिस इन साक्ष्यों को सार्वजनिक नहीं कर रही है, तो संदेह गहराना लाजमी है।
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मेडिकल रिपोर्ट का विरोधाभास: एक तरफ पीड़ित फिरोज़ के शरीर पर बेल्ट और डंडों के निशान हैं, वहीं दूसरी तरफ आरोपियों का दावा है कि फिरोज़ ने उन पर ट्रक चढ़ाने की कोशिश की। सवाल यह है कि यदि फिरोज़ आक्रामक था, तो वह खुद अधमरा होने की स्थिति तक कैसे पहुंचा? क्या पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना कर यह सुनिश्चित किया कि ट्रक चलाने के निशान या संघर्ष के चिह्न किसके पक्ष में हैं?
पुलिस की “क्लीन चिट” और ‘जांच’ का ढोंग?
जांच का बुनियादी सिद्धांत है कि निष्कर्ष अंत में निकलता है। लेकिन इस मामले में पुलिस का यह कहना कि “धर्म से जुड़ा कोई प्रमाण नहीं मिला”, जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
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क्या पुलिस ने उन चश्मदीदों या होटल स्टाफ के बयान दर्ज किए जिन्होंने उस रात वहां हो रही ‘शराब पार्टी’ देखी थी?
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क्या आरोपियों के मोबाइल फोन की लोकेशन और उस समय की उनकी गतिविधियों की जांच की गई?
तहरीर बनाम न्याय: एक खतरनाक चलन
आपका यह सवाल अत्यंत वाजिब है कि “क्या डकैती के मामले में पुलिस डकैतों से भी तहरीर लेती है?”। अक्सर देखा गया है कि रसूखदार पक्ष को बचाने के लिए ‘क्रॉस-केस’ दर्ज कर दिया जाता है ताकि पीड़ित पक्ष दबाव में आकर समझौता कर ले।